वास्तविक संख्याएँ
- एक परिमेय और एक अपरिमेय संख्या का योग या अंतर एक अपरिमेय संख्या होती है।
- एक शून्येतर परिमेय संख्या और एक अपरिमेय संख्या का गुणनफल या भागफल एक अपरिमेय संख्या होती है।
- मान लीजिए कि x = \(\frac{p}{q}\) एक परिमेय संख्या इस प्रकार है कि q का अभाज्य गुणनखंडन 2m.5n के रूप का नहीं है; जहाँ m, n ऋणेतर पूर्णांक हैं। तब, x का असांत आवर्ती दशमलव प्रसार होता है।
बहुपद
गुणनखंड प्रमेय के प्रयोग द्वारा बीजीय व्यंजकों के गुणनखंड बीजीय सर्वसमिकाएँ :बीजीय सर्वसमिकाएँ -
- (x + y)2 = x2 + 2xy + y2
- (x − y)2 = x2 − 2xy + y2
- x2 − y2 = (x + y)(x − y)
- (x + a)(x + b) = x2 + (a + b)x + ab
- (x + y + z)2 = x2 + y2 + z2 + 2xy + 2yz + 2zx
- (x + y)3 = x3 + 3x2y + 3xy2 + y3 = x3 + y3 + 3xy(x + y)
- (x − y)3 = x3 − 3x2y + 3xy2 − y3 = x3 − y3 − 3xy(x − y)
- x3 + y3 = (x + y)(x2 − xy + y2)
- x3 − y3 = (x − y)(x2 + xy + y2)
- x3 + y3 + z3 − 3xyz = (x + y + z)(x2 + y2 + z2 − xy − yz − zx)
- बहुपद के शून्यकों का ज्यामितीय अर्थ : किसी बहुपद p(x) के शून्यक परिशुद्ध रूप से उन बिंदुओं के x-निर्देशांक होते हैं, जहाँ y = p(x) का आलेख x-अक्ष को प्रतिच्छेद करता है।
- एक बहुपद के शून्यकों और गुणांकों में संबंध : यदि α और β एक
द्विघात बहुपद ax2 + bx + c के शून्यक हैं, तो
- दो शून्यकों का योगफल : α + β = \(\frac{-b}{a}\)
- दो शून्यकों का गुणनफल : αβ = \(\frac{c}{a}\)
- यदि α, β और γ किसी त्रिघात बहुपद ax3 + bx2 + cx
+ d के शून्यक हैं, तो
- α + β + γ = −\(\frac{b}{a}\)
- αβ + βγ + γα = \(\frac{c}{a}\)
- αβγ = \(\frac{-d}{a}\)
- विभाजन एल्गोरिथ्म कहती है कि एक बहुपद p(x) और एक शून्येतर बहुपद g(x) दिए रहने
पर, दो बहुपद q(x) और r(x) ऐसे होते हैं कि
p(x) = g(x) q(x) + r(x) जहाँ r(x) = 0 या घात r(x) < घात g(x) है।
दो चरों वाले रैखिक समीकरणों के युग्म
- एक ही (या समान) दो चरों वाले रैखिक समीकरण दो चरों वाले समीकरणों का एक युग्म बनाते हैं।
-
रैेखिक समीकरणों के एक युग्म का व्यापक रूप हैः
- a1x + b1y + c1 = 0
- a2x + b2y + c2 = 0
- यदि रैखिक समीकरणों का एक युग्म संगत (या अविरोधी) होता है तो इसका या अद्वितीय हल अद्वितीय हो या अपरिमित रूप से अनेक हल हों। अपरिमित रूप से अनेक हलों की स्थिति में, रैखिक समीकरणों का यह युग्म आश्रित कहलाता है। इस प्रकार, इस स्थिति में, रैखिक समीकरणों का युग्म आश्रित और संगत होता है। रैेखिक समीकरण का युग्म असंगत (या विरोधी) होता है, यदि उसका कोई हल नहीं हो।
-
मान लीजिए कि a1x + b1y + c1 = 0
और a2x + b2y + c2 = 0 दो चरों वाली रैखिक
समीकरणों का एक युग्म है।
- यदि \(\frac{a_1}{a_2}\) ≠ \(\frac{b_1}{b_2}\) है, तो
- रैखिक समीकरणों का युग्म संगत होता है;
- युग्म का आलेख एक अद्वितीय बिंदु पर प्रतिच्छेद करने वाली रेखाओं का एक युग्म होता है तथा यही प्रतिच्छेद बिंदु समीकरणों के युग्म का हल प्रदान करता है।
- यदि \(\frac{a_1}{a_2}\) = \(\frac{b_1}{b_2}\) ≠ \(\frac{c_1}{c_2}\) है, तो
- रैखिक समीकरणों का युग्म असंगत (या विरोधी) होता है;
- यहाँ आलेख समांतर रेखाओं का एक युग्म होगा और इसलिए समीकरणों के इस युग्म का कोई हल नहीं होगा।
- यदि \(\frac{a_1}{a_2}\) = \(\frac{b_1}{b_2}\) = \(\frac{c_1}{c_2}\) है, तो
- रैखिक समीकरणों का युग्म आश्रित और संगत होता है;
- यहाँ आलेख संपाती रेखाओं का एक युग्म होगा। इन रेखाओं पर स्थित प्रत्येक बिंदु एक हल होगा। इसलिए, समीकरणों के इस युग्म के अपरिमित रूप से अनेक हल होंगे।
- यदि \(\frac{a_1}{a_2}\) ≠ \(\frac{b_1}{b_2}\) है, तो
| क्र.सं. | रेखा युग्म | \(\frac{a_1}{a_2}\) | \(\frac{b_1}{b_2}\) | \(\frac{c_1}{c_2}\) | अनुपातों की तुलना | ग्राफीय निरूपण | बीजगणितीय निरूपण |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| 1 | x − 2y = 0 3x + 4y − 20 = 0 |
\(\frac{1}{3}\) | \(\frac{-2}{4}\) | \(\frac{0}{-20}\) | \(\frac{a_1}{a_2}\) ≠ \(\frac{b_1}{b_2}\) | प्रतिच्छेद करती हुई रेखाएँ | केवल एक हल (अद्वितीय) |
| 2 | 2x + 3y − 9 = 0 4x + 6y − 18 = 0 |
\(\frac{2}{4}\) | \(\frac{3}{6}\) | \(\frac{-9}{-18}\) | \(\frac{a_1}{a_2}\) = \(\frac{b_1}{b_2}\) = \(\frac{c_1}{c_2}\) | संपाती रेखाएँ | अपरिमित रूप से अनेक हल |
| 3 | x + 2y − 4 = 0 2x + 4y − 12 = 0 |
\(\frac{1}{2}\) | \(\frac{2}{4}\) | \(\frac{-4}{-12}\) | \(\frac{a_1}{a_2}\) = \(\frac{b_1}{b_2}\) ≠ \(\frac{c_1}{c_2}\) | समांतर रेखाएँ | कोई हल नहीं |
- रैखिक समीकरण के एक युग्म को बीजीय रूप से निम्नलिखित विधियों में से किसी एक विधि
से हल किया जा सकता हैः
- प्रतिस्थापन विधि
- विलोपन विधि
- वज्र-गुणन विधि:
वज्र-गुणन विधि:
\[\frac{x}{b_1c_2 - b_2c_1} = \frac{y}{c_1a_2 - c_2a_1} = \frac{1}{a_1b_2 - a_2b_1}\]- रैखिक समीकरणों के युग्म को ज्यामितीय/आलेखीय विधि द्वारा भी हल किया जा सकता है।
द्विघात समीकरण
- द्विघात समीकरण: चर x में एक द्विघात समीकरण ax2 + bx + c = 0 के रूप की होती है, जहाँ a, b, और c वास्तविक संख्याएँ हैं तथा a ≠ 0 है।
- द्विघात समीकरण के मूल: एक वास्तविक संख्या & द्विघात समीकरण ax2 + bx + c = 0 का एक मूल कहलाती है, यदि aα2 + bα + c = 0 हो।
- द्विघात समीकरण ax2 + bx + c = 0 के मूल वही होते हैं, जो द्विघात बहुपद ax2 + bx + c के शून्यक होते हैं।
- गुणनखंडन को विधि द्वारा एक द्विघात समीकरण के मूल ज्ञात करना: यदि हम एक द्विघात बहुपद ax2 + bx + c के गुणनखंड कर लेते हैं, तो ax2 + bx + c के रैखिक गुणनखंडों को शून्य के बराबर करके द्विघात समीकरण ax2 + bx + c = 0 के मूल ज्ञात किए जा सकते हैं।
- पूर्ण वर्ग बनाने की विधि द्वारा द्विघात समीकरण के मूल ज्ञात करना: एक उपयुक्त अचर को जोड़ कर और घटा कर उसे हम x2 और x के पदों के साथ मिलाते हैं, ताकि एक पूर्ण वर्ग बन जाए और फिर उन्हें x के लिए हल करते हैं।
- द्विघात सूत्र: यदि b2 − 4ac ≥ 0 हो, तो द्विघात समीकरण ax2 + bx + c = 0 के वास्तविक मूल \[x = \frac{-b \pm \sqrt{b^2 - 4ac}}{2a}\]
- व्यंजक b2 − 4ac द्विचात समीकरण का विविक्तकर कहलाता है।
-
एक द्विघात समीकरण के मूलों का अस्तित्व : एक द्विघात समीकरण
ax2 + bx + c = 0 के
- दो भिन्न वास्तविक मूल होते हैं, यदि b2 − 4ac > 0 है।
- दो बराबर वास्तविक मूल होते हैं, यदि b2 − 4ac = 0 है।
- कोई वास्तविक मूल नहीं होते हैं, यदि b2 − 4ac < 0 है।
समांतर श्रेढ़ी
- एक समांतर श्रेढी (AP) संख्याओं की एक ऐसी सूची होती है जिसमें प्रत्येक पद अपने से पिछले पद में (प्रथम पद a को छोड़ कर) एक निश्चित संख्या d जोड़ कर प्राप्त होता है। यह निश्चित संख्या d इस AP का सार्व अंतर कहलाती है। एक AP का व्यापक रूप a, a + d, a + 2d, a + 3d, … है।
- संख्याओं a1, a2, a3, … को सूची में, यदि अंतर a2 − a1, a3 − a2, a4 − a3, … एंक ही मान दें, अर्थात् k के विभिन्न मानों के लिए ak+1 − ak, एक ही हो, तो प्राप्त संख्याओं की सूची एक AP होती है।
- किसी AP का nवाँ पद (या व्यापक पद) \[a_n = a + (n - 1)d\] होता है, जहाँ a प्रथम पद और d सार्वं अंतर है। ध्यान दीजिए कि a1 = a है।
- किसी AP के प्रथम n पदों का योग Sn निम्नलिखित से प्राप्त होता है: \[S_n = \frac{n}{2}[2a + (n - 1)d]\] यदि n पदों वाली AP का अंतिम पद l है, तो इसके सभी पदों का योग निम्नलिखित से भी प्राप्त किया जा सकता है: \[S_n = \frac{n}{2}[a + l]\] कभी-कभी Sn को S से भी व्यक्त किया जाता है।
- यदि किसी AP के प्रथम n पदों का योग Sn हो, तो इस AP का nवाँ पद an निम्नलिखित से प्राप्त होता है:
- \[a_n = S_n - S_{n - 1}\]
निर्देशाक ज्यामिति
- कार्तीय पद्धति (या निकाय)
- निर्देशांक अक्ष
- मूलबिंदु
- चतुर्थांश
- भुज
- कोटि
- एक बिंदु के निर्देशांक
- क्रमित युग्म
- कार्तीय तल में, क्षैतिज रेखा x-अक्ष तथा ऊर्ध्वाधर रेखा y-अक्ष कहलाती है।
- निर्देशांक अक्ष तल को चार भागों में विभक्त कर देती है जो चतुर्थांश कहलाते हैं।
- अक्षों के प्रतिच्छेद बिंदु को मूलबिंदु कहते हैं।
- किसी बिंदु का भुज या x-निर्देशांक उसकी y-अक्ष से दूरी होती है तथा किसी बिंदु की कोटि या y-निर्देशांक उसकी x-अक्ष से दूरी होती है।
- (x, y) उस बिंदु के निर्देशांक कहलाते हैं जिसका भुज x हो तथा कोटि y हो।
- x-अक्ष पर स्थित किसी बिंदु के निर्देशांक (x,0) के रूप के होते हैं तथा y-अक्ष पर स्थित किसी बिंदु के निर्देशांक (0,y) के रूप के होते हैं।
- मूलबिंदु के निर्देशांक (0, 0) होते हैं।
- प्रथम चतुर्थाश सें किसी बिंदू के निर्देशांक कै जिल्ल (+, +). द्वितीय अतुर्थाश सें (−,+), तीसरे सङुर्थाश सें (−,−) तथा चौथे जुर्थाश मेँ (+, −) होते हैं।
- दो बिंदुओं P(x1, y1) और Q(x2, y2) के बीच की दूरी = \[\sqrt{(x_2 - x_1)^2 + (y_2 - y_1)^2}\]
- किसी बिंदु P(x, y) की मूलबिंदु से दूरी \[\sqrt{x^2 + y^2}\]
- उस बिंदु P के निर्देशांक, जो बिंदुओं A(x1, y1) और B(x2, y2) को मिलाने वाले रेखाखंड को आंतरिक रूप से m1 : m2 के अनुपात में विभाजित करता है, \[\Bigg(\dfrac{m_1x_2 + m_2x_1}{m_1 + m_2}, \dfrac{m_1y_2 + m_2y_1}{m_1 + m_2}\Bigg)\]
- बिंदुओं P(x1, y1) और Q(x2, y2) को मिलाने वाले रेखाखंड के मध्य-बिंदु के निर्देशांक \[\Big(\frac{x_1 + x_2}{2}, \frac{y_1 + y_2}{2}\Big)\]
- शीर्षो A(x1, y1), B(x2, y2) और C(x3, y3) वाले त्रिभुज का क्षेत्रफल = \[\frac{1}{2}[x_1(y_2 - y_3) + x_2(y_3 - y_1) + x_3(y_1 - y_2)]\]
- जिसका शून्येतर मान होता है, जब तक कि A, B और C सरेख न हों। यह मान सदैव धनात्मक ही लिया जाता है।
त्रिकोणमिति का परिचय और उसके अनुप्रयोग
- कर्ण = h
- आधार = b
- लम्ब = p
-
एक त्रिभुज ABC, जिसका कोण B समकोण है, कोण A के त्रिकोणमितीय अनुपात इस
प्रकार त्रिकोणमितीय परिभाषित किए जाते हैं:
- ∠A का sine(साइन) = sin A = \(\frac{p}{h}\) = \(\frac{BC}{AC}\)
- ∠A का cosine (कोसाइन) = cos A = \(\frac{b}{h}\) = \(\frac{AB}{AC}\)
- ∠A का tangent (टैनजेंट) = tan A = \(\frac{p}{b}\) = \(\frac{BC}{AB}\)
- ∠A का cosecant (कोसीकेंट) = cosec A = \(\frac{1}{\text{sin } A}\) = \(\frac{AC}{BC}\)
- ∠A का secant (सीकेंट) = sec A = \(\frac{1}{\text{cos } A}\) = \(\frac{AC}{AB}\)
- ∠A का cotangent (कोटैंजेंट) = cot A = \(\frac{1}{\text{tan } A}\) = \(\frac{AB}{BC}\)
- tan A = \(\frac{\text{sin } A}{\text{cos } A}\)
- cot A = \(\frac{\text{cos } A}{\text{sin } A}\)
- यदि कोण वही रहे, तो एक कोण के त्रिकोणमितीय अनुपात त्रिभुज कौ भुजाओं की लंबाइयों के साथ बदलते (विचरित) नहीं हैं।
- यदि किसी कोण का एक त्रिकोणमितीय अनुपात दिया हो, तो उसके अन्य त्रिकोणमितीय अनुपात निर्धारित किए जा सकते हैं।
-
कोणों 0°, 30°, 45°, 60° और 90° के त्रिकोणमितीय अनुपात :
A 0° 30° 45° 60° 90° 0 \(\frac{\pi}{6}\) \(\frac{\pi}{4}\) \(\frac{\pi}{3}\) \(\frac{\pi}{2}\) sin A 0 \(\frac{1}{2}\) \(\frac{1}{\sqrt{2}}\) \(\frac{\sqrt{3}}{2}\) 1 cos A 1 \(\frac{\sqrt{3}}{2}\) \(\frac{1}{\sqrt{2}}\) \(\frac{1}{2}\) 0 tan A 0 \(\frac{1}{\sqrt{3}}\) 1 \(\sqrt{3}\) परिभाषित नहीं cosec A परिभाषित नहीं 2 \(\sqrt{2}\) \(\frac{2}{\sqrt{3}}\) 1 sec A 1 \(\frac{2}{\sqrt{3}}\) \(\sqrt{2}\) 2 परिभाषित नहीं cot A परिभाषित नहीं \(\sqrt{3}\) 1 \(\frac{1}{\sqrt{3}}\) 0 - sin A या cos A का मान 1 से अधिक कभी नहीं होता है, जबकि cosec A या sec A का मान सदैव 1 से बड़ा या उसके बराबर होता है।
-
पूरक कोणों के त्रिकोणमितीय अनुपातः
- sin (90° − A)= cos A, cos (90° − A)= sin A
- tan (90° − A)= cot A, cot (90° − A) = tan A
- sec (90° − A) = cosec A, cosec (90° − A) = sec A
-
त्रिकोणमितीय सर्वसमिकाएँ:
- cos2 A + sin2 A = 1
- 1 + tan2 A = sec2A
- cot2 A + 1 = cosec2 A
- किसी प्रेक्षक की आँख से उस वस्तु के बिंदु तक की रेखा जिसे प्रेक्षक देखता है ’दृष्टि रेखा कहलाती है।
- देखी जाने वाली वस्तु का ‘उन्नयन कोण’ बह कोण है जो दृष्टि रेखा क्षेतिज रेखा से बनाती है, जबकि वह वस्तु क्षेतिज स्तर रेखा से ऊपर होती है।
- देखी जाने वाली वस्तु का ‘अवनमन कोण’ वह कोण है जो दृष्टि रेखा क्षैतिज रेखा से बनाती है, जबकि वह वस्तु क्षेतिज स्तर (रेखा) से नीचे होती है।
- किसी वस्तु की ऊंचाई या लंबाई अथवा दो भिन्न वस्तुओं के बीच की दूरी त्रिकोणमितीय अनुपातों को सहायता से निर्धारित की जा सकती है।
वृत्तों से संबंधित क्षेत्रफल
सरल बंद आकृतियों के परिमाप और क्षेत्रफल। वृत्त की परिधि और क्षेत्रफल। वृत्ताकार पथ (अर्थात् एक वलय) का क्षेत्रफल। वृत्त का त्रिज्यखंड और उसका केंद्रीय कोण-दीर्घ और लघु त्रिज्यखंड। वृत्तखंड-दीर्घ और लघु वृत्तखंड।- वृत्त की परिधि = 2πr और वृत्त का क्षेत्रफल = πr2 होता है, जहाँ r वृत्त की त्रिज्या है।
- त्रिज्याओं r1 और r2(r1 > r2) वाले दो संकेंद्रीय वृत्तों से बनने वाले वृत्ताकार पथ का क्षेत्रफल = \[\pi r_1^2 - \pi r_2^2 = \pi(r_1^2 - r_2^2)\]
- त्रिज्या r वाले एक वृत्त के त्रिज्यखंड का क्षेत्रफल, जिसका केंद्रीय कोण θ है, \(\frac{\theta}{360^{\circ}}\) × πr2 होता है, जहाँ θ को डिग्री (अंशों) में मापा गया है।
- त्रिज्या r वाले एक वृत्त के त्रिज्यखंड के चाप को लंबाई, जिसका केंद्रीय कोण θ है, \(\frac{\theta}{360^{\circ}}\) × 2πr होती है, जहाँ θ को डिग्री (अंशों) में मापा गया है। आकृति 11.1 में दिये लघु वृत्तखंड APB का क्षेत्रफल = त्रिज्यखंड OAPB का क्षेत्रफल - δ OAB का क्षेत्रफल।
- त्रिज्या r वाले एक दीर्घ त्रिज्यखंड का क्षेत्रफल πr2 − संगत लघु त्रिज्यखंड का क्षेत्रफल होता है।
- त्रिज्या r वाले एक वृत्त के एक दीर्घ वृत्तखंड का क्षेत्रफल πr2 − संगत लघु वृत्तखंड का क्षेत्रफल होता है।
- टिप्पणी: जब तक अन्यथा न कहा जाये, r का मान ज लिया जायेगा।
पृष्ठीय क्षेत्रफल और आयतन
- घनाभ जिसकी लंबाई = \(l\), चौड़ाई =
\(b\) और ऊँचाई = \(h\)
- घनाभ का आयतन = \(lbh\)
- घनाभ का कुल या संपूर्ण पृष्ठीय क्षेत्रफल =
\(2(lb + bh + hl)\) - घनाभ का पार्श्वं पृष्ठीय क्षेत्रफल = \(2h(l + b)\)
- घनाभ का विकर्ण = \(\sqrt{l^2 + b^2 + h^2}\)
- घन जिसका किनारा या कोर = \(a\)
- घन का आयतन = \(a^3\)
- घन का पार्श्व पृष्ठीय क्षेत्रफल = \(4a^2\)
- घन का कुल पृष्ठीय क्षेत्रफल = \(6a^2\)
- घन का विकर्ण = \(a\sqrt{3}\)
- बेलन जिसकी त्रिज्या = \(r\), ऊँचाई =
\(h\)
- बेलन का आयतन = \(\pi r^2h\)
- बेलन का वक्र पृष्ठीय क्षेत्रफल = \(2πrh\)
- बेलन का कुल पृष्ठीय क्षेत्रफल= \(2πr(r + h)\)
- शंकु जिसकी ऊँचाई = \(h\), त्रिज्या =
\(r\) और तिर्यक ऊँचाई = \(l\)
- शंकु का आयतन = \(\frac{1}{3}\pi r^2h\)
- शंकु का वक्र पृष्ठीय क्षेत्रफल = \(πrl\)
- शंकु का कुल पृष्ठीय क्षेत्रफल = \(πr(l + r)\)
- शंकु की तिर्यक ऊँचाई (\(l\)) = \(\sqrt{h^2 + r^2}\)
- गोला जिसकी त्रिज्या = \(r\)
- गोले का आयतन = \(\frac{4}{3}\pi r^3\)
- गोले का पृष्ठीय क्षेत्रफल = \(4\pi r^3\)
- आअर्धगोला जिसकी त्रिज्या = \(r\)
- अर्धगोले का आयतन = \(\frac{2}{3}\pi r^3\)
- अर्धगोले का वक्र पृष्ठीय क्षेत्रफल = \(2\pi r^2\)
- अर्धगोले का कुल पृष्ठीय क्षेत्रफल = \(3\pi r^3\)
- मौलिक ठोसों, अर्थात् घनाभ, शंकु, बेलन, गोले और अर्धगोले में से किन्हीं दो ठोसों के संयोजन से बनी वस्तु का पृष्ठीय क्षेत्रफल।
- मौलिक ठोसों, अर्थात् घनाभ, शंकु, बेलन, गोले और अर्धगोले में से किन्हीं दो ठोसों के संयोजन से बनी वस्तु का आयतन।
- शंकु के छिन्नक से संबंधित सूत्र हैं:
- शंकु के छिन्नक का आयतन = \(\frac{1}{3}\pi h[r^{2}_{1} + r^{2}_{2} + r_{1}r_{2}]\)
- शंकु के छिन्नक का वक्र पृष्ठीय क्षेत्रफल = \(\pi(r_1 + r_2)l\)
- ठोस शंकु के छिन्नक का कुल या संपूर्ण पृष्ठीय क्षेत्रफल = \(\pi l(r_1 + r_2) + \pi r_1^2 + \pi r_1^2\),
जहाँ \(l\) = \(\sqrt{h^2 + (r_1 - r_2)^2}\),
\(h\) = छिन्नक की ऊर्ध्वाधर ऊँचाई, \(l\) = छिन्नक की तिर्यक ऊंचाई तथा \(r_1\) और \(r_2\) छिन्नक के आधारों (सिरों) की त्रिज्याएँ हैं।
- ठोस अर्धगोला : यदि अर्धगोले की त्रिज्या \(r\) है, तो वक्र पृष्ठीय क्षेत्रफल = \(2\pi r^2\), कुल पृष्ठीय क्षेत्रफल = \(3\pi r^2\), तथा आयतन = \(\frac{2}{3}\pi r^3\)
- गोलाकार खोल खोल (शेल) का आयतन = \(\frac{4}{3}\pi\Big(r^3_1 - r^3_2\Big)\), जहाँ \(r_1\) और \(r_2\) क्रमशः बाहरी और आंतरिक त्रिज्याएँ हैं। इस पूरे अध्याय में, जब तक कि अन्यथा न कहा जाये, \(\pi = \frac{22}{7}\) लीजिए।
सांख्यिकी और प्रायिकता
सांख्यिकी
‘सांख्यिकी’ का अर्थ, प्राथमिक और गौण आँकड़े, यथाप्राप्त/अवर्गीकृत आँकडे। आँकड़ों का परिसर (परास), वर्गीकृत आँकड़े - वर्ग अंतराल, वर्ग चिह, आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण - बारंबारता बंटन सारणी, विच्छिंद (असतत) बारंबारता बंटन तथा सतत बारबारता बंटन।- आंकड़ों का आलेखीय निरूपण
- दंड आलेख
- एक समान चौड़ाई तथा असमान चौड़ाई वाले आयतचित्र
- बारंबारता बहुभुज
- केंद्रीय प्रवृति के मापक
- माध्य
- यथाप्राप्त आँकडों का माध्य = \[\overline{x} = \frac{x_1 + x_2 + \dots + x_n}{n} = \frac{\displaystyle\sum_{i = 1}^{n}x_i}{n}\] जहाँ x1, x2, x3, …, xn, n प्रेक्षण हैं।
- अवर्गीकृत आँकडों का माध्य = \(\overline{x} = \sum\frac{f_ix_i}{f_i}\) जहाँ fi, xi की बारंबारताएँ हैं।
- माध्यक माध्यक आँकड़ों का वह मान है जो आँकडों को दो बराबर भागों में बाँटता है, जब
कि आँकड़ों को आरोही (या अवरोही) क्रम में व्यवस्थित कर लिया गया है। माध्यक
का परिकलन: जब आँकड़ों को आरोही (या अवरोही) क्रम में व्यवस्थित कर लिया
गया है, तो इन आँकडों का माध्यक निम्नलिखित प्रकार से परिकलित किया जाता है:
- जब प्रेक्षणों की संख्या (n) विषम है, तो माध्यक \(\big(\frac{n + 1}{2}\big)^{th}\) प्रेक्षण होता है।
- जब प्रेक्षणों को संख्या (n) सम है, तो माध्यक \(\big(\frac{n}{2}\big)^{th}\) और \(\big(\frac{n}{2} + 1\big)^{th}\) प्रेक्षणों का औसत या माध्य होता है।
- बहुलक वह प्रेक्षण जो अधिकतम बार आता है, अर्थात् अधिकतम बारंबारता वाला प्रेक्षण
बहुलक कहलाता है। अवर्गीकृत आँकड़ों का बहुलक प्रेक्षि/देख कर ही निर्धारित किया जा सकता
है। प्रायिकता
- यादृच्छिक (या यदुच्छ) प्रयोग या केवल एक प्रयोग
- एक प्रयोग के परिणाम
- एक प्रयोग के अभिप्रयोग का अर्थ
- यादृच्छिक प्रयोग, किसी प्रयोग के परिणाम, घटनाएँ, प्रारंभिक घटनाएँ।
- समप्रायिक परिणाम
- एक घटना E की प्रायोगिक (आनुभविक) प्रायिकता जिसे P(E) से व्यक्त करते हैं,
- n(E) = अभिप्रयोगों की संख्या जिनमें घटना घटित हुई है, n(S) अभिप्रयोगों की कुल
संख्या
निम्नलिखित से दी जाती हैः \(P(E) = \frac{n(E)}{n(S)}\) जहाँ प्रयोग के परिणाम समप्रायिक हैं।
- घटना E की प्रायिकता 0 से 1 तक कोई भी संख्या हो सकती है। विशेष स्थितियों में यह 0 या 1 भी हो सकती है।
- माध्य
- जहाँ हल कल्पना करते हैं कि प्रयोग के सभी परिणाम समप्रायिक हैं।
- एक निश्चित (या निर्धारित) घटना की प्रायिकता 1 होती है।
- एक असंभव घटना का प्रायिकता 0 होती है।
- घटना E की प्रायिकता एक ऐसी संख्या P(E) है कि 0 ≤ P(E) ≤ 1
- वह घटना जिसका केवल एक ही परिणाम हो एक प्रारंभिक घटना कहलाती है। किसी प्रयोग की सभी प्रारंभिक घटनाओं की प्रायिकता का योग 1 होता है।
- किसी भी घटना E के लिए \[P(E) + P(\overline{E}) = 1\] जहाँ E घटना ‘E नहीं’ को व्यक्त करता है। E और E पूरक घटनाएँ कहलाती हैं।
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